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Bihar Politics : महागठबंधन को किसने तोड़ा? सियासी समीकरण या तेजस्वी की ‘मैं’ नीति.

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Bihar Politics : बिहार में हो रहे उपचुनाव ( By-Election In Bihar ) ने महागठबंधन में दरार ला दिया है. आरजेडी और कांग्रेस, एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं. इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि बिहार में महागठबंधन को किसने तोड़ा?

Bihar Politics : बिहार की राजनीति में हवा काफी तेजी से उठ रहा है कि आखिर बिहार का गठबंधन क्यों टूटा? महागठबंधन ( Mahagathbandhan ) किसने तोड़ा और महागठबंधन के टूटने की मूल वजह क्या है? बिहार में हो रहे दो सीटों पर उपचुनाव के लिए कांग्रेस और राजद ( Congress-RJD ) आमने-सामने हो गई तो अब अखिलेश सिंह ( Akhilesh Singh ) ने कह दिया कि राजद ने गठबंधन तोड़ दिया और इसके लिए राजद ही जिम्मेदार है.

इधर, तेजस्वी यादव ( Tejashwi Yadav ) ने कहा कि हम दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारेंगे, इसके लिए पहले ही हमने कांग्रेस को बता दिया था. वहीं, कांग्रेस का कहना है कि बता देना और समर्थन लेना, दोनों में अंतर होता है. हमें इस बात की जानकारी नहीं दी गई कि दोनों सीटों पर वह जबरन उम्मीदवार उतार देंगे.

बिहार की राजनीति में सियासी ( Bihar Politics ) ढांचे की पटकथा खूब सुनाई जा रही है लेकिन हकीकत वाली राजनीति पर अभी भी पर्दा पड़ा हुआ है. दरअसल, दोनों राजनीतिक दल एक दूसरे के राजनीति पर भी सियासी जमीन और नए राजनैतिक तैयारी से अब खुद को अलग करना चाह रहे हैं क्योंकि हर कोई एक दूसरे में बड़ा दिख रहा है और उम्मीदों की जो बानगी दोनों राजनीतिक दल को दिख रही है, वह काफी दूर जा रही है.

गठबंधन तोड़ने का सबसे पहला ठीकरा तेजस्वी यादव पर फोड़ा जा रहा है तो सबसे पहले बात तेजस्वी यादव की ही कर लेते हैं. तेजस्वी यादव को कांग्रेस की सियासत राजद की तरह विरासत में मिली. जिस तरह से तेजस्वी यादव को राजद की राजनीति ( Bihar Politics ) करनी थी, नीतियों में लगभग ही कांग्रेस को भी रखना था, लेकिन तेजस्वी की अब जो नीति चल रही है उसमें कांग्रेस कहीं न कहीं दूसरे रास्ते पर खड़ी दिख रही है.

उसकी वजह साफ तौर पर दिख भी जाता है. महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ अगर कांग्रेस आंदोलन करती है, धरना प्रदर्शन करती है तो उसमें तेजस्वी नहीं आते. अगर कांग्रेस प्रदेश स्तर पर किसी तरह की बात करना चाहती है तो तेजस्वी उसके लिए तैयार नहीं होते. तेजस्वी यादव ने 2020 के विधानसभा चुनाव में साफ कर दिया था. वह प्रदेश के नेताओं से बात नहीं करेंगे, सिर्फ समझौते की कोई भी बात सीधे सोनिया या राहुल गांधी से हो रही थी, जो प्रदेश स्तर पर कांग्रेस के नेताओं को नागवार गुजरने लगा था.

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तेजस्वी की एक सियासत यह भी थी कि झारखंड में कांग्रेस के सहयोग से हेमंत की सरकार चल रही है और लालू यादव झारखंड में थे तो ऐसे में माना जा रहा था कि तेजस्वी यादव कांग्रेस के माध्यम से हेमंत सरकार पर यह दबाव बनाएंगे कि वहां उनके पिता को कुछ अतिरिक्त चीजें मिल जाए, लेकिन वह मिल नहीं पाई.

नाराजगी की एक वजह यह भी थी यूपी चुनाव में यह तय है कि तेजस्वी यादव अखिलेश यादव के साथ खड़े होंगे. उत्तर प्रदेश में जिस तरीके से प्रियंका गांधी कांग्रेस को मजबूत करने में उतरी हुई हैं, उसमें सियासी दांव पेंच के बीच कांग्रेस के साथ तेजस्वी यादव का बिहार वाला समझौता उत्तर प्रदेश की राजनीति पर असर डाल भी सकता है, यह भी एक वजह हो सकती है.

साथ में जो तीसरी सबसे बड़ी वजह कही जा रही है, वह तेजस्वी यादव के नजर में यह भी है कि लोकसभा चुनाव में जब राष्ट्रीय राजनीति को बिहार के फलक पर देना है तो वहां कांग्रेस की कोई रणनीति साफ तौर पर दिखती नहीं. मुद्दों में कांग्रेस केंद्र की नीतियों में केंद्र की सरकार सरकार से किनारे ही खड़ी दिखती है तो ऐसे में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से किसी तरह का मुद्दों में फायदा मिलेगा या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता.

जबकि तेजस्वी यादव यह जानते हैं कि विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय मुद्दे में लालू यादव की विरासत ही कांग्रेस को वोट दिलवाई है और तेजस्वी यादव इसे अब कांग्रेस से बांटना नहीं चाह रहे हैं. एक नाराजगी हाल के दिन में कन्हैया के आने के बाद भी हुआ. सियासी सूत्रों में इस बात की चर्चा है कि दिल्ली में जब कन्हैया को कांग्रेस में शामिल कराया जा रहा था तो तेजस्वी यादव समय दिल्ली में थे और तेजस्वी यादव ने कन्हैया को कांग्रेस में लाने से मना भी किया था लेकिन कांग्रेस इस बात को नहीं मानी.

यही वजह है कि कांग्रेस के बगैर तेजस्वी यादव ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार दिए. अगर तेजस्वी की नजर से इस गठबंधन के टूटने के कारणों को देखा जाए तो पूरी तौर पर यह कुछ ऐसे कारण हैं जो दिख रहे हैं लेकिन 1990 के बाद से राजनीतिक जमीन को जिस तरीके से कांग्रेस पीछे खड़ी होकर राजद के साथ तैयार कर रही है, राजद अब उस से पीछा छुड़ाना चाह रही है.

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बात कांग्रेस के नजरिए की करें तो निश्चित तौर पर जो जमीन कांग्रेस की थी, उसे लालू यादव ने तोड़ा था. सियासत में कांग्रेस की मजबूरी बन गई कि लालू यादव के साथ खड़ी रहे लेकिन 2009 में केंद्र की राजनीति में जिस तरीके से सोनिया गांधी ने लालू यादव को तरजीह नहीं दी और मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में उन्हें जगह भी नहीं मिली, उसके बाद बिहार में इस लड़ाई का होना माना जा रहा था.

2010 में दोनों राजनीतिक दल बिहार विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़े लेकिन दोनों राजनीतिक दलों की हुई मटिया पलीत ने फिर से दोनों लोगों को राजनीति ( Bihar Politics ) का एक सुर बोलने को मजबूर कर दिया. 2015 से राजनीति में दोनों राजनीतिक दल जमीन और जनाधार बनाने में कामयाब हुए तो सियासत में मुद्दे बदलने लगे लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस राजद को बहुत कुछ दे नहीं पाई.

राजद को भी पता है कि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मजबूरी यही है कि वह लालू यादव के साथ सियासत करती रही क्योंकि लालू यादव अगली पंक्ति के नेता हैं. लेकिन तेजस्वी की राजनीति को आज की कांग्रेस मानने के लिए इसलिए भी तैयार नहीं हो रही है कि तेजस्वी यादव उस पंक्ति के नेता हैं, जिसमें अगली सीट पर बैठने वाले कांग्रेस के कई ऐसे दिग्गज हैं जो अपनी वरिष्ठता को बताने की कोशिश भी करते हैं और वरिष्ठ हैं भी, उसे तेजस्वी मानने को तैयार नहीं है.

राजनीति के इस विभेद को कांग्रेस पाटना चाहती है और यही वजह है कि अगर आज कांग्रेस किसी स्टैंड पर नहीं जाती है तो उसे बिहार में जिस तरीके से 1990 के बाद लालू के पीछे खड़े होकर राजनीति करनी पड़ी है, कांग्रेस की पूरी राजनीति ही तेजस्वी की राजनीति के पीछे खड़ी हो जाएगी जो अब कांग्रेस के नेता नहीं चाहते हैं.

दूसरी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि जो आरोप लालू यादव पर लगे और साबित होने में इतना ज्यादा वक्त लगा कि कांग्रेस समेटने में कामयाब रही, लेकिन तेजस्वी यादव पर आरोप है, उसे कांग्रेस अब अपने दामन का दाग नहीं बनाना चाहती. यह एक बड़ी वजह है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार या उस मुद्दे पर किसी दागदार दामन वाले लोगों के साथ आगे सियासत नहीं करना चाहती. खासतौर से यह मामला बिहार में प्रासंगिक भी हो रहा है.

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तीसरी बड़ी वजह उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रियंका गांधी की मजबूती से उतरना और सपा के साथ तेजस्वी का समर्थन जो 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक दूसरे के सामने खड़ा होगा. उसकी पहली परिणति भी कही जा सकती है. एक और बड़ी वजह यह भी माना जा सकता है कि कन्हैया जब से कांग्रेस ज्वाइन किए हैं, चेहरे की लड़ाई में कांग्रेस ने तेजस्वी के बराबर एक चेहरा दे दिया है. ऐसे में तेजस्वी में अपना प्रतिद्वंदी दिख रहा है और कांग्रेस इस चीज को भजाना भी चाह रही है. यह भी एक वजह है कि अब कांग्रेस और राजद अपनी राजनीति कर रहे हैं और राह अलग कर लिए हैं.

बिहार में तेजस्वी के इस तेवर से राजनीति में विभेद कांग्रेस के साथ अब हुआ है. हालांकि यह कोई नई बात नहीं है. उपेंद्र कुशवाहा इसी विभेद के कारण तेजस्वी वाली सियासत से अलग हुए थे. जीतन राम मांझी भी कभी तेजस्वी के साथ मंच साझा करते थे. 2020 के चुनाव में उसी साझेदारी के साथ लड़ना भी चाहते थे लेकिन वह भी आगे नहीं बढ़ पाए. वीआईपी के मुकेश साहनी ने होटल मौर्या में जिस तरीके की बातें तेजस्वी यादव को कही थी, वह भी सियासत में एक कहानी है.

महागठबंधन के टूटने पर सवाल तो कई खड़े हो रहे हैं लेकिन जवाब एक ही है कि तेजस्वी को नेतृत्व करने को लेकर जिस तरीके की राजनीति करनी चाहिए, उसमें परिपक्वता निश्चित तौर पर झलक रही है. क्योंकि इतिहास के पन्नों को खंगाला जाए तो कांग्रेस से अलग जाकर के राजद को बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला है और राजद को छोड़कर के कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन और जनाधार ही खोज रही है.

यही वजह है कि कांग्रेस और राजद के मजबूत होने के कारण दूसरे राजनीतिक दल महागठबंधन का हिस्सा बने थे लेकिन कमजोर हो रहे तेजस्वी यादव और टूट रहे महागठबंधन से एक बात तो साफ है कि राजद का जनाधार अपने विपक्षी पार्टियों को रोक पाने में उस आधार पर तो कमजोर हो ही रहा है जो महागठबंधन के टूटने से सियासी समीकरण लेकर खड़ा होगा.


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