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Navratri 2021: यहां हुआ था चंड-मुंड का वध, 1900 साल से हो रही है पूजा.

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Navratri 2021 : बिहार के भभुआ जिला केद्र से चौदह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है कैमूर की पहाड़ी. साढ़े छह सौ फीट की ऊंचाई वाली इस पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामण्डलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है.

Navratri 2021 : शारदीय नवरात्र का पावन समय चल रहा है. मंदिरों में आस्था का जमघट लगा हुआ है. इसी कड़ी में आपको ले चलते हैं बिहार के उस देवी स्थल की ओर, जिसका अपना अलग ही धार्मिक महत्व है.

कैमूर की पहाड़ी पर स्थित है मंदिर :

बिहार के कैमूर जिले में स्थित है महामाई मुंडेश्वरी धाम. कहते हैं कि देवी मां ने युगों पहले यहीं पहाड़ी पर चण्ड मुंड नाम के राक्षसों का वध किया था. बिहार के भभुआ जिला केद्र से चौदह किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है कैमूर की पहाड़ी. साढ़े छह सौ फीट की ऊंचाई वाली इस पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामण्डलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है.

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दुर्गासप्तशती में है वर्णन :

इस बारे में दुर्गासप्तशती में भी कथा आती है. कहते हैं कि चंड-मुंड के नाश के लिए जब देवी उद्यत हुई थीं तो चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी में छिप गया था और यहीं पर माता ने उसका वध किया था. इसीलिए यहां देवी मुंडेश्वरी माता के नाम से स्थानीय लोगों में जानी जाती हैं.

1900 सालों से हो रही है पूजा :

मुंडेश्वरी मंदिर की प्राचीनता का महत्व इस दृष्टि से और भी अधिक है कि यहां पर पूजा की परंपरा 1900 सालों से लगातार चली आ रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है.

भारत का सबसे प्राचीन मंदिर :

यह मंदिर भारत का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है. मंदिर परिसर में विद्यमान शिलालेखों से इसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है. 1838 से 1904 ई. के बीच कई ब्रिटिश विद्वान व पर्यटक यहां आए थे. प्रसिद्ध इतिहासकार फ्रांसिस बुकनन भी यहां आए थे. मंदिर का एक शिलालेख कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में है. पुरातत्वविदों के अनुसार यह शिलालेख 349 ई. से 636 ई. के बीच का है.

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कुछ गड़रिये ने खोजा था मंदिर :

इस मंदिर का उल्लेख कनिंघम ने भी अपनी पुस्तक में किया है. उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि कैमूर में मुंडेश्वरी पहाड़ी है, जहां मंदिर ध्वस्त रूप में विद्यमान है. इस मंदिर का पता तब चला, जब कुछ गडरिये पहाड़ी के ऊपर गए और मंदिर के स्वरूप को देखा. प्रारम्भ में पहाड़ी के नीचे निवास करने वाले लोग ही इस मंदिर में दीया जलाते और पूजा-अर्चना करते थे. धीरे-धीरे लोगों की भी मान्यता बढ़ी. आज नवरात्र में श्रद्धालु पूजा करने जुटते हैं.


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