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Appointment of Principal in Bihar School : सुनिए मुख्यमंत्री जी… सिस्टमवे लीक है! कैसे होगी इतनी ‘कड़ी परीक्षा’?

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स्वतंत्रता दिवस पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि अब स्कूलों में हेडमास्टर बनने के लिए शिक्षकों को प्रतियोगिता परीक्षा पास करना होगा. इसके साथ उन्होंने अन्य कई घोषणाएं की हैं. बिहार के लोग कई मोर्चों पर जूझ रहे हैं, वहां भी हेडमास्टर की तलाश है. सरकार को उस ओर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने बिहार की शिक्षा (Bihar Education) में गुणात्मक बदलाव के लिए 15 अगस्त को नया ऐलान कर दिया. नीतीश कुमार ने कहा कि हेड मास्टर उन्हीं को बनाया जाएगा जो परीक्षा पास करेंगे. बिहार में मास्टर की नौकरी के लिए कड़ी परीक्षा होती है. परीक्षा इतनी कड़ी होती है कि जब पेपर अंदर खुलता है, उससे पहले ही बाहर सारे प्रश्न उत्तर बनकर आ जाते हैं.

निश्चित तौर पर इसमें नीतीश कुमार की कोई कमी नहीं है, इसमें कमी उन अधिकारियों की होती है, जिनके पास परीक्षा को कराने की जिम्मेदारी होती है. यह दीगर बात है कि फजीहत पूरे देश में होती है. अब नीतीश कुमार ने कह दिया कि मास्टरी के बाद हेड मास्टर वही बनेंगे जो परीक्षा पास करेंगे. दरअसल, बिहार में हर चीज एक परीक्षा के दायरे में है. नीतीश कुमार को परीक्षा से आगे जाकर चीजें दिख नहीं रही हैं. यही वजह है कि 15 अगस्त पर उन्होंने हेड मास्टर के लिए परीक्षा का आदेश दे डाला.

सबसे पहले नीतीश की पार्टी की ही बात कर लेते हैं. नीतीश की पार्टी में जब हेड मास्टर के चयन की बात आई, तो यहां भी परीक्षा की बात शुरू हो गई. आरसीपी सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. तय हुआ कि सामान्य जाति का वोट जदयू को आ जाएगा. लेकिन, फिर सवाल में एक चीज छूट गई कि एक विषय में पास होने से पूरा उत्तर सही नहीं होगा और सियासत में पास होने के लिए जितने अंक लाना है, उसमें पार्टी पीछे रह जाएगी.

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मामला आगे बढ़ा तो फिर चयन की प्रक्रिया शुरू हुई. किस जाति के आधार पर किस को मजबूत जिम्मेदारी दी जाए, उसमें एक लंबी बहस भी चली. सियासत में सवाल भी उठे विपक्ष का आरोप भी आया और उसके बाद नीतीश के ललन सिंह ने पार्टी की कमान संभाल ली. हेड मास्टर बने ललन को जो परीक्षाएं देनी पड़ी उसमें आरसीपी सिंह का उत्तर भी था और उपेंद्र कुशवाहा से मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी भी थी.

अब पार्टी की हेड मास्टरी ललन सिंह को मिल गई तो नीतीश कुमार को इस बात की तसल्ली हो गई कि चलिए सियासत की जिस परीक्षा को पार्टी ने खड़ा किया था, उसमें असली हेड मास्टर को चुन करके उन्होंने एक पैराग्राफ को खत्म कर दिया.

अब बात बिहार की करें तो 2020 के चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी बहुत कुछ कर नहीं पाई. सरकार बनानी थी तो हेड मास्टर के चयन की बात शुरू हो गई. बीजेपी बड़ी पार्टी भले बनी, लेकिन बीजेपी अपना हेड मास्टर नीतीश कुमार को ही रखना चाहती थी. लंबी सियासत के सवाल और जवाब के बाद ये तय हुआ कि नीतीश कुमार ही हेड मास्टर होंगे.

सियासत में जो परीक्षा जनता के बीच नीतीश कुमार को देनी थी उसमें उतना पूर्णांक तो नहीं आया, लेकिन उसके बाद भी हेड मास्टरी नीतीश कुमार को मिल गई. ज्यादा नंबर लाने के बाद भी बीजेपी बड़े बाबू की भूमिका में ही रह गई और आज भी नीतीश कुमार की हेड मास्टरी में ही बिहार की राजनीतिक पाठशाला में एबीसीडी की पढ़ाई कर रही है. नीतीश कुमार बिहार के हेड मास्टर बन गए परीक्षा में नंबर चाहे जितने आए हो.

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बिहार में एक और परीक्षा हुई थी, जिसमें जिस केंद्र में परीक्षा हो रही थी उसके हर तल्ले पर लोग लटककर अपने कैंडिडेट को पास करवा रहे थे. सरकार के नुमाइंदों की आंख पड़ी ही नहीं. भला हो मीडिया का कि उसने सब कुछ दिखा दिया, जिसने टॉप किया उसे बिहार की अंग्रेजी तक नहीं आती थी. परीक्षा थी, उसने दे दी, पास भी हो गई और बिहार को टॉप कर गई. यह दीगर बात है कि जो परीक्षा ली गई और जिस तरीके से परीक्षा के परिणाम आए वो भले मन के ना रहे हो, लेकिन परीक्षा लेने का जो सरकार का मन था वह तो हो ही गई थी.

ये बातें 15 अगस्त पर इसलिए नहीं कही जा रही है कि नीतीश की कही गई बातों से किसी बिहारी को गुरेज होगा. लेकिन, संतोष इसलिए भी नहीं है कि जो डबल इंजन की सरकार चल रही है वो उस इंतजाम को जनता को क्यों नहीं दे पा रही है, जिसमें हर साल बिहार की जनता बाढ़ की विभीषिका में जलती है और जिंदगी जीने की परीक्षा देती है. नीतीश कुमार इस चीज को क्यों साफ नहीं कर पा रहे हैं कि अपराध जिस तरीके से सिर चढ़कर बोल रहा है और जनता हलकान है, उसमें पुलिस की परीक्षा फेल क्यों हो रही है.

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शराबबंदी के बाद जिस तरीके से धड़ल्ले से बिहार में शराब मिलती है, उसमें पूरे प्रशासनिक अमले की परीक्षा क्यों किनारे पर खड़ी हो जा रही है. रोजगार के लिए सरकार को जिस मजबूत तैयारी के साथ हेड मास्टरी करनी है, वहां आम जनता भटकती क्यों दिख रही है. बात शिक्षकों की बहाली की हो, बिहार में बाढ़ की हो, सुरक्षा की हो, नौकरी की हो, अध्यापकों के मिलने की हो, उच्च शिक्षा में सुधार की हो, यहां जो भी काम करने वाले लोग हैं, वो हर परीक्षा में फेल हैं. लेकिन, फिर भी निगरानी की जिम्मेदारी उन्हीं के पास है.

कभी पूर्वांचल का कैंब्रिज कहा जाने वाला पटना विश्वविद्यालय आज अपनी बदहाली पर रो रहा है. विश्वविद्यालय में एक दर्जन से ज्यादा विभाग ऐसे हैं, जिनके पास पूर्णकालिक अध्यापक है ही नहीं. अब सवाल यह है कि बिहार के हेड मास्टर का जिम्मा नीतीश कुमार ने लिया है, लेकिन हर फेल हुई व्यवस्था पर जिस तरीके की सियासत और फेल होने के बाद भी हेड मास्टर जी का तमगा लिए लोग टहल रहे हैं.

अगर इसे जमीन पर उतरकर नहीं देखा गया तो बिहार की हर बानगी ही फेल हो जाएगी. बस कुछ बचेगा तो जुबान हिलाने के लिए हेड मास्टर की परीक्षा का शिगूफा और 15 अगस्त पर बिहार को दे दिया जाने वाला एक अंतहीन काम जो पढ़ाई नहीं है. पढ़ाने के लिए परीक्षा देने का काम जरूर करवाना पड़ेगा.


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